होश की जाग्रति “Awareness” (A Spiritual Story)

होश की जाग्रति “Awareness” (A Spiritual Story)

होश की जाग्रति

“Awareness”

(A Spiritual Story)

एक व्यक्ति जो कि उस देश का बहुत बड़ा व्यापारी था। कामकाज से उसे फुरसत ही नहीं मिलती थी। बेआरामी के कारण उसका स्वास्थ्य बिगड़ने लगा। उसके डाक्टरों ने उसे सलाह दी कि वह थोड़ा वक्त अपने लिए निकालें और व्यापार से छुट्टी लेकर कहीं रमणीय जगहों की सैर करें। इससे उनके स्वास्थ्य में सुधार होगा और जीवन में फिर से नई ताजगी आएगी।

व्यापारी को लगा कि वह अगर घूमने निकल गया तो व्यापार को तो कर्मचारी देख लेंगे कुछ दिनों, मगर घर किसके हवाले करके जाऊं?  कीमती सामान है घर में। जेवरात हैं, धन संपत्ति है। कोई ऐसा विश्वास पात्र व्यक्ति न पाकर उसने सोचा कि अपना जीवन बचाना भी जरूरी है इसलिए जाना तो होगा। उसने अपना सामान तैयार किया और निकलते समय अपने मुख्य नौकर से कहा कि वह घूमने जा रहा है और कभी भी आ सकता है इसलिए उसके वापस आने की पूरी तैयारी होनी चाहिए।

जो उसका मुख्य नौकर था वह तो हमेशा ही अलर्ट रहने लगा। पता नहीं कब मालिक वापस आ जाएं।
जब भी कोई द्वार पर आता, खटखटाता वह तुरंत रोज की ही तरह पूरी तैयारी से द्वार पर पहुंचता। उस व्यक्ति का नियम था कि उसके जूते खोलने होते थे। हाथ पांव धुलवाने होते थे फिर पोछने के लिए एक अलग नौकर होता था। फिर वह अंदर जाता था। आरामदायक कुर्सी पर बैठता फिर उसके कपड़े उतारे जाते थे। फिर एक गिलास शरबत और कुछ खाने को लाया जाता और बाद में एक कप चाय।
यह उसका रोज का नियम था।

क्योंकि वह न तो कोई वक्त बता कर गया है ना कोई समय बता कर गया है और ना ही कोई तारीख बता कर गया है। सुबह, शाम, रात कुछ भी नहीं बता कर गया है। वह नौकर इतना अवेयर रहने लगा कि उसका पूरा जीवन ही बदल गया। जरा सा भी खट की आवाज कहीं होती वह दौड़ कर दरवाजे पर भागता। वह ध्यान में ही रहने लगा और उसका होश बहुत बढ़ गया। और एक दिन जब बे वक्त पर करीब सुबह के दो बजे मालिक आया। उसके दरवाजा खटखटाने से पहले, आहट से ही वह नौकर दरवाजे पर पहुंच गया। मालिक तो हैरान हो गया कि तैयारी पूरी थी। वह समझ गया क्योंकि नौकर पूरी तरह होश में था।

मालिक कई दिनों तक नौकर के व्यवहार को देखता रहा और उसे आश्चर्य था कि इसको कुछ कहने से पहले ही यह कर देता है। इसको इतना होश आया कैसे! लगभग एक साल तक उसे नौकर को कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी। यहां तक कि उसने दरवाजा भी इस एक साल में नहीं खटखटाया था।

एक साल के बाद एक दिन उसने नौकर के कमरे में झांक कर देखा। उसे ऐसा लगा था जैसे उसके कमरे में से रौशनी की किरणें आ रही हैं। नौकर ध्यान में बैठा था। उस समय वह चुपके से चला गया। मगर बाद में उसने उसको अपना गुरु बना लिया और उससे होश में जीने के टिप्स लेने लगा।
जब जीवन मरण का प्रश्न आ जाए तभी होश और ध्यान घटता है। यह जीवन का शाश्वत नियम है कि
बेहोशी तब तक ही रह सकती है जब तक मौत की निरंतर याद नहीं है। जैसे ही जीवन दांव पर लगता है बेहोशी विदा हो जाती है। परम होश जग जाता है।

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"प्रेम" मुक्त-आकाश में उड़ती सुगंध की तरह होता है उसे किसी चार-दिवारी में कैद नहीं किया जा सकता। ~ तुराज़