प्रज्ञा चाहिए “Wisdom Needed” (Motivational Thoughts)

प्रज्ञा चाहिए  “Wisdom Needed” (Motivational Thoughts)

प्रज्ञा चाहिए

“Wisdom Needed”

(Motivational Thoughts)

 

अगर मनुष्य इस जीवन को थोड़ा ध्यान से देखे, इस कुदरत को थोड़ा रुक कर देखे, तो उसे यहां पुनरावृत्ति दिखाई देती है। रोज सूरज निकलता है। रोज हवाएं बह रही है। रोज पानी की धाराएं, नदियां लगातार बहती जाती है।

हर जीव रोज यहां अपने कृत्यों को दोहराते चला जाता है। रोज सुबह उठकर वही पेट के लिए दौड़, संग्रहित करने की दौड़, अपने को साफ सुथरा रखने की इच्छा, यह सब रोज पुनरावृति होती रहती है।

एक चक्र लगातार चलता रहता है। घूमता रहता है। यानी इस जगत में कुछ भी असाधारण नहीं होता। बहुत साधारण दिखाई देता है। क्योंकि रोज वही हो रहा है। रोज वही पुनरावृति हो रही है। लेकिन इस साधारण दिखने वाली पुनरावृति में सब कुछ ही असाधारण होता है।

यानी साधारण दिखने वाली सभी चीजें बहुत असाधारण होती है। कोई प्रज्ञा वान कोई विवेकशील मनुष्य ही इसको अनुभव कर पाता है। इसको समझ पाता है। इसको जान पाता है।

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"प्रेम" मुक्त-आकाश में उड़ती सुगंध की तरह होता है उसे किसी चार-दिवारी में कैद नहीं किया जा सकता। ~ तुराज़

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