हां कॉकरोच हूं मैं! “Yes, I am a cockroach” (Hindi Poetry)

हां कॉकरोच हूं मैं! “Yes, I am a cockroach” (Hindi Poetry)

हां कॉकरोच हूं मैं!

 

“Yes, I am a cockroach”

 

(Hindi Poetry)

 

पहले गंदगी पैदा करते हैं

खुद उसी में पलते हैं, बढ़ते हैं

फिर सफेदपोश, महलों में चले जाते हैं

जब उस गंदगी में कॉकरोच उग आते हैं

फिर उनको देखकर

उनका मजाक बनाते हैं

 

 

कॉकरोच पूछता है आज –

कॉकरोच हूं मैं!

कॉकरोच क्यों हूं मैं?

कॉकरोच बना नहीं हूं मैं!

कॉकरोच बनाया गया हूं मैं !

कॉकरोच उगाया गया हूं मैं!

 

 

कॉकरोच गंदगी में बनता है

कॉकरोच गंदगी में पलता बढ़ता है

गंदगी कौन करता है?

 

 

मैं कॉकरोच क्यों हूं पूछते हो तुम

पूछो उनसे जो

गंदगी फैलाते हैं

समाज में गंदगी

वो कौन हैं जानते हो तुम?

 

 

समाज के ठेकेदार हैं वो

धर्म के ठेकेदार हैं वो

देश के पालनहार हैं वो

असल में

गंदगी के पोषक हैं वो

 

 

कॉकरोच बनाते हैं वो

फिर कॉकरोच कह कर चिढ़ाते हैं वो

तुमने सुना है ना

कुछ लोग घर जलाकर

बुझाने चले आते हैं

वो अपने को मसीहा कहलाते हैं

 

 

रोज दूसरे के घरों में कूड़ा फेंकते हैं

अपने सिपाहियों को भेजकर

फिर घर की छानबीन कर जाते हैं

वहां कूड़ा डालकर कॉकरोच बनाते हैं

फिर उनका कॉकरोच कहकर

मजाक बनाते हैं

 

 

कॉकरोच तड़प रहा है

अपनी हस्ती के लिए लड़ रहा है

वो हुक्मरान

उसका हक छीन लेते हैं

पैदा करके फिर

उसका ही भोजन छीन लेते हैं

 

 

जब हुकूमत चाहिए होती है

कुर्सी पर बात आन पड़ती है

तो बहला फुसलाकर, धोखे से

उनसे वोट डलवा लेते हैं

कॉकरोच के वोट से उनकी

हुकूमत चलती है

 

 

फिर कुर्सी पर बैठकर

हाथ में कानून की किताब ले

उसका हक छीनकर

उस मासूम का निवाला छीनकर

उसी को कॉकरोच कहकर चिढ़ाते हैं

उसका मजाक बनाते हैं

 

 

उसकी भी कोई हस्ती है

कॉकरोच ही सही वह

मगर वह डॉक्टर बनना चाहता है

प्रोफेशर बनना चाहता है

वह भी अपने को गंदगी से

निकालना चाहता है

 

 

मगर घूश की तरह

बिलों में रहने वाले यह सफेद कीड़े

उसके पेपरों को

रातों रात खा जाते हैं

इन्होंने “नेट” खा लिया

इन्होंने “नीट” खा लिया

इन्होंने न जाने कितने

अच्छे अच्छे इंसानों को खा लिया

 

 

अब यह कॉकरोच भी खाएंगे

उनको अपनी हुकूमती ताकतों से रौंदेंगे

लेकिन कॉकरोच में बहुत जान होती है

वह आसानी से मरता नहीं

वह हर परिस्थिति में रहता है

कॉकरोच अपने दुश्मन की तरफ भागता है

पीठ नहीं दिखाता

सीने पर मार खाता है

 

 

कॉकरोच खत्म होना चाहता है

कॉकरोच आमूल नष्ट होना चाहता है

कॉकरोच अपनी गंदी व्यवस्था को

साफ करना चाहता है

जब गंदगी ही मिट जाएगी

गंदगी फैलाने वाले मिट जाएंगे

कॉकरोच स्वतः मिट जाएगा

सब साफ हो जाएगा

 

 

आओ कॉकरोच को जड़ से मिटाएं

उनके साथ मिलकर गंदगी को मिटाएं

जब कॉकरोच का सपना पूरा हो जाएगा

सब गंदगी मिट जाएगी

कॉकरोच कहकर चिढ़ाने वाले

सफेद पहनकर दूसरे पर

कीचड़ उछालकर हंसने वाले

सब मिट जाएंगे इनके

नामों निशान मिट जाएंगे

 

 

तब एक महामानव पैदा होगा

जो सब कॉकरोच का जोड़ होगा

स्वतंत्र होगा, निष्पक्ष होगा, कुशल होगा

तब जीवन में खुशहाली होगी

वह बुद्ध भी होगा और कृष्ण भी

वह पैगम्बर भी होगा और ईसा भी

तब सबका बराबर का हक होगा

तब ही धरती पर असली मानव होगा

उसकी मानवता होगी “तुराज़”

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"प्रेम" मुक्त-आकाश में उड़ती सुगंध की तरह होता है उसे किसी चार-दिवारी में कैद नहीं किया जा सकता। ~ तुराज़