मेरे अपने जो भूल गए
” My Forgotten me”
(Hindi Poetry)
रौशनी दिखती नहीं पर
चिराग अभी तक जल रहा
कोई बुदबुदाहट ओंठो की
कोई खरखराहट सांसों की
कोई लाठी की खटखटाहट
अब सुनाई नहीं पड़ती,
नहीं सुनाई पड़ती अब
खांसने की आवाजें
रातों के घोर तिमिर में
चिराग जलता रहा था
अभागों को रौशनी दिखती ही नहीं थी
कोई उल्लू नहीं बैठता चिराग के तले
न कोई चमगादड़ उल्टा लटकता वहां
पर जो अपना बनाया था गुलशन कभी
आज उसका हर गुल मुंह मोड़ता सा दिखा
कोई अपना, कोई पराया
देखता है कभी रास्ते में व्हील चेयर पर
ठिठक सा जाता है सांत्वना दिए
कोई ओंठ से दबा लेता है मन को
कोई बयां कर कहता है इससे अच्छा होता….
लेकिन चिराग जल रहा है अभी
फिर भी तिमिर में दिख नहीं रहा
शरीर से चमड़ी अलग हो गई
कदम आगे को उठते नहीं
पर मन आज भी
नव दुल्हन की तरह नए सपने बुन रहा
अकेलापन दीमक की तरह
खोखला कर रहा है जीवन को
फिर भी कोई अपना रक्त सिंचित
पास आने में कतरा सा रहा
कोसता ही रहता है अपने को
इस अथाह मानसिक, शारीरिक पीड़ा में
पर मौत दस्तक देती ही नहीं
खाली हाथ, खाली रिश्ते
उबाऊ भरा अब यह जीवन
समय मानो ठहर सा गया हो
चारपाई पर लेटकर
दीवारों पर टकटकी लगा
वह चित्र बनाता रहता है
जीए हुए जीवन के
आज कोई सूनी पड़ी कुर्सी
खाली पड़ी खटिया
चीख चीख कर कहती है
कि चिराग बुझ चुका है
सब सूना पड़ चुका है
चिराग बुझ गया जहां
उन घरों में अब कोई सिसकता नहीं
कोई लाठी, वाकर खिसकता नहीं
कोई खांसता, ख़खारता नहीं
कोई अपने मोहल्ले में, गलियों में
अब चलता दिखता नहीं
उनके अपने भी उनको भूल चुके हैं
दिवाल पर टंगी तस्वीरों पर भी
अब उनकी नजर जाती नहीं
अचरज है –
जिस मां के बगैर वह कभी सोता नहीं था
जिस बाप की अंगुली पकड़े बिना
वह चलता नहीं था
आज उन्हीं को वृद्धा आश्रम भेजकर
वह अपनी खुशी समझता है
चेहरा न दिखे उनका तो सुकून समझता है
जब चिराग बुझ जाएगा
तब घर पर तिमिर गहन हो जाएगा
उसी सूनी कुर्सी के ऊपर कोई
उल्लू या चमगादड़ लटक जाएगा
तब शायद किसी भ्रमित बच्चे को
अपने बड़े बूढ़े का एहसास हो पाएगा
तब भी क्या…
जब चिराग बुझ ही गया हो
तो अब घर कहां रौशन हो पाएगा… “तुराज़”