कोयले की कीमत
“Price of a Coal”
(Hindi Poetry)
कोयले की सी जिंदगी थी मेरी
दबा हुआ था कहीं जमीन में
कर्मों की दलदल में डूबता डूबता
सूख चुका था मैं शायद!….
लंबी कहानी है, इतिहास बड़ा है
सब प्रयास ना काफी गुजरे
दबते दबते जमीं पर
जनम जनम बीते.……..
कोई कभी क्यों खोजेगा
जमीन के नीचे जाकर
वह भी कोयले को
जिसके पास कालिख के सिवा
कुछ और है ही नहीं!…..
पर एक आस थी किसी की
सुलग सके अगर यह कोयला
दहक सके, दे सके ज्वाला
बुझा सके पेट की अग्नि को…..
मैं एक कोयले की तरह
खोजा गया था खान से
युगों युगों से दबे हुए प्राण को
प्रकट किया था देह में…..
मेरी अग्नि को भड़काने में
किस ईश्वर का हाथ है
मुझे नहीं पता!
नहीं पता मुझे
किसने मुझे जलाया होगा
राख कर दिया होगा….
मेरी मैं की अग्नि को
किस महापुरुष ने खोद कर
निकाला और जला दिया
राख बना दिया मुझे
कि मैं उड़ सकूं
हवा के संग बह सकूं
दूर क्षितिज को छू सकूं
उगते सूरज में मिल सकूं…….
राख कर दिया मुझे
राख कर दिया मेरी हस्ती को
जमीं के अंदर से निकाल कर
आसमां में उड़ा दिया मुझ पत्थर को…..
कौन था वह ?
क्या नाम दूं उसको?
भगवान कहूं?
इंसान कहूं?
गुरु कहूं या मजदूर कहूं?
क्या कहूं उसे तुराज़????…..