सहज समाधि
“Effortless Samadhi”
(Spiritual Poetry)
जब तक तुम हो
तब तक बस तुम ही हो
जब तुम खो जाते हो
तब ही तुम पा जाते हो
अलख अगम की वह धारा
निर्लेप निष्पक्ष निगम है
जब मौन प्रखर हो जाता है
तब धर्म मुखर हो उठता है
दो हाथों की ताली का
शोर जगत सुन लेता है
जब एक हाथ से बजती है ताली
कोई सूर सहज सुन लेता है
क्या है करने जैसा
जब सब मिट ही जाता है
अनित्य जगत में
नित्य की छाया
कोई बुद्ध ही पकड़ पाता है
जीवन के धुंधलेपन में
कभी चमक सी कौंध जाती है
जब कोई बुद्ध की दृष्टि
अकस्मात हम पर पड़ जाती है
तब सूखे तरुवर में जैसे
नई कोंपले उठ आती हैं
तन मन की पीड़ा जो
बहुत बड़ी थी अब तलक
सब जार जार हो जाती है
रौशन हो उठता है तन मन
और ध्यान गहन हो जाता है
सहज समाधि
लग जाती है
भव बंधन कट जाता है