चिंता क्यों करते हैं?
“Why to Worry”
(Motivational Thoughts)
चिंता क्यों करते हैं? चिंता करने से किसी भी समस्या का समाधान नहीं होता बल्कि मानसिक और शारीरिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
चिंतन, मनन किसी भी विचार को तभी तक करना चाहिए जब तक वह हमारे नियंत्रण में हो हम उसकी गहराई में जा सकें। अगर हम किसी समस्या, किसी विचार का हल न निकाल पा रहे हों तो बेहतर है कि हम किसी ज्ञानी की सलाह लें और समस्या को सुलझाने संबंधी कुछ तथ्य जुटा लें।
“चिंता ता कि कीजिए जो अनहोनी होए” संत जन हमसे कहते हैं कि कुछ भी चिंता करने जैसा नहीं है क्योंकि कुछ भी अनहोनी जैसा नहीं है। बस हम अपने स्वार्थवश, मोहवश, लोभवश, अहंकारवश उन गुत्थियों को सुलझा लेना चाहते हैं जो हमारे वश में ही नहीं हैं।
अज्ञानता ही हमारा सबसे बड़ा दुश्मन है। हम इन दुनियां के पदार्थों को, यहां के भोग विलास को सदा सुख समझ बैठें हैं और उनको जोड़ने, बनाए रखने , बटोरने का प्रयास कर रहे हैं। जबकि कुछ भी इस दुनियां में ऐसा नहीं है जो सदा के लिए रहने वाला है। यहां तक कि यह शरीर भी अभी है और अगले पल नहीं हो जाएगा।
हमारी अविद्या हमारा अज्ञान हमें दिखाई ही नहीं देता और अहम वश हम अपने को ज्ञानी माने चले जाते हैं और इस अनित्य जगत को नित्य समझ यहां चिंता में डूबे हुए हैं उनके लिए जो हमें नहीं मिला। या हमें मिला भी तो अब वह चला गया।
अज्ञान से ऊपर उठने का एक ही उपाय है कि हम ज्ञानियों की शरण लें। संतों की शरण लें, उनके उपदेशों पर अपने जीवन को ढालें। हम सदा के लिए चिंता से मुक्त हो जाएंगे।
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